पश्चिम एशिया में ईरान, इस्त्राइल और अमेरिका के बीच बढ़ते सैन्य तनाव ने वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की सबसे महत्वपूर्ण समुद्री जीवनरेखा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को जोखिम में डाल दिया है। ऊर्जा बाजार विश्लेषकों और इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (आईईए) के आकलन के अनुसार, यदि संघर्ष लंबा खिंचता है या इस समुद्री मार्ग पर बाधा आती है, तो भारत की तेल और गैस आपूर्ति के साथ-साथ निर्यात व्यापार भी प्रभावित हो सकता है। इसी आशंका को देखते हुए भारत सरकार संभावित ऊर्जा और व्यापारिक संकट को लेकर सतर्क हो गई है।
यूएस एनर्जी इन्फॉर्मेशन एडमिनिस्ट्रेशन (ईआईए) के अनुसार फारस की खाड़ी से निकलने वाला अधिकांश तेल स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से होकर गुजरता है, जो दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा समुद्री मार्गों में से एक है। यह जलडमरूमध्य अपने सबसे संकरे हिस्से में लगभग 33 किमी चौड़ा है। भारत के संदर्भ में यह मार्ग और भी महत्वपूर्ण है क्योंकि देश अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 90 प्रतिशत आयात करता है। पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (पीपीएसी) के आंकड़ों के मुताबिक भारत प्रतिदिन करीब 25 से 27 लाख बैरल कच्चा तेल आयात करता है।
इसका बड़ा हिस्सा इराक, सऊदी अरब, कुवैत और यूएई से आता है। यही जहाज होर्मुज मार्ग से होकर भारतीय बंदरगाहों तक पहुंचते हैं। ऊर्जा बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि तेल कीमतों में मामूली उतार-चढ़ाव भी भारत की अर्थव्यवस्था पर बड़ा प्रभाव डाल सकता है। कमोडिटी बाजार विश्लेषण के अनुसार, कच्चे तेल की कीमत में हर 1 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी से भारत के वार्षिक आयात बिल में लगभग 2 अरब डॉलर तक की वृद्धि हो सकती है।
यदि वैश्विक तनाव के कारण कीमतों में लगातार 10 डॉलर तक की बढ़ोतरी होती है तो भारत पर अतिरिक्त 13 से 14 अरब डॉलर का बोझ पड़ सकता है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं तो भारत को उतनी ही मात्रा का तेल खरीदने के लिए अधिक डॉलर खर्च करने पड़ते हैं, क्योंकि तेल का व्यापार वैश्विक स्तर पर डॉलर में होता है। इससे भारत का आयात बिल बढ़ जाता है, जबकि निर्यात उतनी तेजी से नहीं बढ़ता। नतीजतन देश से बाहर जाने वाली विदेशी मुद्रा ज्यादा हो जाती है, जिससे चालू खाते का घाटा (करंट अकाउंट डेफिसिट) बढ़ने लगता है।
