प्रदेश के सभी मंडलों में ब्लड बैंकों का नेटवर्क तैयार किया जाएगा। नेटवर्क होने से थैलेसीमिया के मरीजों और अन्य जरूरतमंदों को आसानी से हर ग्रुप का रक्त उपलब्ध होगा। किसी भी ब्लड बैंक में रक्त के एक्सपायर होने की नौबत नहीं आएगी।
प्रदेश में करीब 400 ब्लड बैंक हैं। इनमें 105 सरकारी अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों में हैं। हर साल करीब 25 लाख यूनिट ब्लड की जरूरत पड़ती है। इसमें करीब 30 फीसदी स्वैच्छिक रक्तदान से मिलता है और बाकी मरीजों के परिजन डोनेट करते हैं। ऐसे ही करीब 36 थैलेसीमिया व हीमोफीलिया उपचार केंद्र हैं। इस बीमारी के पीड़ितों को करीब 21 दिन में औसतन एक यूनिट रक्त चढ़ाना पड़ता है। कई बार कुछ ब्लड बैंकों में अलग-अलग ग्रुप के रक्त बच जाते हैं जिसे फेंकना पड़ता है। वहीं, कई ब्लड बैंकों में निगेटिव समूह के रक्त की कमी बनी रहती है। इन समस्याओं को देखते हुए ब्लड बैंकों का नेटवर्क तैयार किया जा रहा है। इससे हर समूह का रक्त जरूरतमंदों को आसानी से उपलब्ध हो सकेगा।
पहले चरण की शुरुआत लखनऊ मंडल से हो रही है। मंडल से जुड़े हरदोई, लखीमपुर खीरी, रायबरेली, सीतापुर और उन्नाव जिलों के ब्लड बैंकों को जोड़ा जा रहा है। इसके लिए राम सागर मिश्र संयुक्त चिकित्सालय साढ़ामऊ के सीएमएस डॉ. वीके शर्मा को नोडल ऑफिसर बनाया गया है। वह डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान के ब्लड बैंक के प्रभारी भी रह चुके हैं। अपर निदेशक डॉ. जीपी गुप्ता ने बताया कि नए प्रयोग के जरिये हर मरीज को उनके ही जिले में आसानी से रक्त उपलब्ध कराने का प्रयास किया जा रहा है। इसके लिए नोडल अधिकारी ब्लड बैंकों की कार्यप्रणाली में सुधार कराएंगे। रक्तदान के लिए विभिन्न स्थानों पर जागरूकता कार्यक्रम भी चलाया जाएगा। यह प्रयोग सफल रहा तो पूरे प्रदेश में इसे लागू किया जाएगा l
