नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने वाणिज्यिक समझौतों में मध्यस्थता के प्रावधानों के प्रारूपण पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि मध्यस्थता प्रक्रिया का दुरुपयोग मामलों को जटिल बनाने और उन्हें लम्बा खींचने के लिए किया जा रहा है। जस्टिस सूर्यकांत व जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने इस तरह के समझौतों में अस्पष्टता के तरीके पर गंभीर चिंता जताई और अदालतों को निर्देश दिया कि वे घटिया ढंग से तैयार किए गए प्रावधानों को शुरू से ही खारिज करने की दिशा में अटल रवैया दिखाएं।
सुप्रीम कोट ने कहा, भारत में वाणिज्यिक समझौतों में मध्यस्थता के प्रावधानों का मसौदा तैयार करने में बहुत कुछ अपेक्षित नहीं है। मध्यस्थता को त्वरित और प्रभावी विवाद समाधान सुनिश्चित करने के साधन के रूप में पेश किए जाता है। इसके बावजूद यह स्पष्ट और विडंबनापूर्ण है कि कुछ मामलों में, विवादों के समाधान को और अधिक जटिल बनाने और उसे लंवा खींचने के लिए इस प्रक्रिया का दुरुपयोग किया गया है। पीठ ने कहा, यह प्रशासनिक लापरवाही के कारण हुआं या अपर्याप्त कानूनी सलाह से, इस पर अलग से विचार करना बेहतर होगा। शीर्ष अदालत दिल्ली नगर निगम और कुछ निजी ठेकेदारों के बीच पार्किंग और वाणिज्यिक परिसरों के विकास के लिए किए गए कई रियायत समझौतों से जुड़े दिल्ली हाईकोर्ट के दिए निर्णयों को चुनौती वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी।
