नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भूमि अधिग्रहण के सभी मामलों में आर्थिक मुआवजे के अलावा संपत्ति मालिकों का पुनर्वास आवश्यक नहीं है। शीर्ष कोर्ट ने कहा कि इन मामलों में संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत आजीविका के अधिकार से वंचित करने का तर्क टिक नहीं सकता। सरकार की ओर से उठाए गए किसी भी लाभकारी कदम को केवल भूमि मालिकों के प्रति निष्पक्षता व समता के मानवीय दृष्टिकोण से निर्देशित किया जाना चाहिएं।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने कहा, केवल दुर्लभतम मामलों में ही सरकार विस्थापित व्यक्तियों को मुआवजा देने के अलावा उनके पुनर्वास के लिए कोई योजना शुरू करने पर विचार कर सकती है। अदालत ने इस बात की कड़ी निंदा की कि कई बार राज्य सरकारें लोगों को खुश करने के लिए अनावश्यक योजनाएं शुरू कर देती हैं और अंततः मुश्किलों में पड़ जाती हैं। इससे अनावश्यक रूप से मुकदमे भी बढ़ते हैं।
हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण के संपदा अधिकारी की ओर से दायर अपील पर दिए फैसले में पीठ ने कहा कि यह मुकदमा देश के सभी राज्यों के लिए आंख खोलने वाला है। जस्टिस पारदीवाला ने 87 पृष्ठों के फैसले में लिखा है, यदि किसी सार्वजनिक उद्देश्य के लिए भूमि की जरूरत होती है तो कानून सरकार को भूमि अधिग्रहण अधिनियम या किसी अन्य राज्य अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार अधिग्रहण की अनुमति देता है। जब किसी सार्वजनिक उद्देश्य के लिए भूमि अधिग्रहण होता है तो जिस व्यक्ति की भूमि ली जाती है, वह कानून के सिद्धांतों के अनुसार उचित मुआवजे का हकदार होता है।
