नई दिल्ली। देशभर के स्कूलों, कॉलेजों और कोचिंग संस्थानों में विद्यार्थियों की आत्महत्या के बढ़ते मामलों और उनके मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ीं समस्याओं पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने शुक्रवार को शैक्षणिक संस्थानों के लिए 15 बाध्यकारी दिशा-निर्देश जारी किए। इसके तहत सभी संस्थानों के लिए काउंसलिंग, शिकायत निवारण तंत्र और नियामक ढांचा बनाना अनिवार्य है।
इनका पालन तब तक अनिवार्य रहेगा, जब तक सरकार विद्यार्थियों की आत्महत्याओं को रोकने के लिए कोई कानून या नियामक ढांचा नहीं बनाती। केंद्र और राज्य सरकारों को 90 दिनों में इस पर अनुपालन रिपोर्ट पेश करनी होगी।
जस्टिस विक्रम नाथ व जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने विशाखापट्टनम में छात्रावास की छत से गिरने के बाद संदिग्ध हालात में मरने वाली 17 वर्षीय नीट उम्मीदवार के मामले में फैसला करते हुए यह दिशा-निर्देश जारी किए। पीठ ने नीट अभ्यर्थी की मौत की सीबीआई जांच के आदेश भी दिए। पीठ ने कहा, सभी शैक्षणिक संस्थान उम्मीद मसौदा दिशा-निर्देशों, मनो दर्पण पहल और राष्ट्रीय आत्महत्या रोकथाम रणनीति से प्रेरणा लेते हुए समान मानसिक स्वास्थ्य नीति अपनाएंगे और लागू करेंगे।
नीति की हर साल समीक्षा की जाएगी और इसे अपडेट किया जाएगा। इसे संस्थानों की वेबसाइटों व नोटिसबोर्ड पर सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराया जाएगा। उम्मीद (समझना, प्रेरित करना, प्रबंधन करना, सहानुभूति देना, सशक्त बनाना और विकसित करना) मसौदा दिशा-निर्देश का मकसद स्कूली विद्यार्थियों की आत्महत्याओं को रोकना है। इसे शिक्षा मंत्रालय ने 2023 में जारी किया था।
