दीपावली पर प्लास्टिक से बनी कार्बाइड गन से पूर्वांचल के 65 बच्चों की आंखों की रोशनी चली गई है। इनके रोशनी वापस लाने का अब सर्जरी ही विकल्प है।
यूट्यूब पर देखकर 300 रुपये में प्लास्टिक के पाइप से बनाई इस गन का दो महीने पहले पिछली दिवाली पर जमकर उपयोग किया गया। आंखें जख्मी हुई तो पूर्वांचल और बिहार से बच्चों को बीएचयू, बनारस के बाकी अस्पतालों में इलाज के लिए लाया गया। इनमें से 30 से ज्यादा बच्चों की उम्र 5 से 14 साल है। 18 से 23 साल के 10 युवाओं की आंखों की रोशनी भी गई है।
कार्बाइड के चलते इन बच्चों के आंखों की काली पुतली आपस में चिपक गई। इन बच्चों का दो महीने से इलाज चल रहा है। कुछ बच्चों की सर्जरी बीएचयू के क्षेत्रीय नेत्र संस्थान में जनवरी के दूसरे हफ्ते में होना है। दीपावली पर वाराणसी सहित आजमगढ़, गाजीपुर, मऊ, बलिया, जौनपुर सहित अन्य जिलों में बच्चों ने प्लास्टिक वाली कार्बाइड गन का जमकर इस्तेमाल किया है।
बाजार में जहां पटाखे की गोली छोड़ने के लिए बंदूक 500 रुपये और उससे ज्यादा कीमत पर मिलती थी, वहीं बच्चों ने सोशल मीडिया पर कार्बाइड वाली गन बनाने का तरीका देख खुद बनाई है। इनमें 300 रुपये के समान का इस्तेमाल किया। कुछ छोटे कस्बों में ठेले और छोटे दुकानदारों ने भी इसे बेचा है।
बीएचयू ने इस पर शोध कराया है जिसको गुवाहाटी में आयोजित दो दिवसीय अखिल भारतीय नेत्र चोट संस्थान के वार्षिक सम्मेलन में रेजिडेंट डॉक्टर, प्रेरणा चौधरी शोध पत्र प्रस्तुत करेंगी। क्षेत्रीय नेत्र संस्थान के प्रो. दीपक मिश्रा ने बताया कि दीपावली के बाद से ही कार्बाइड वाली गन से चोटिल बच्चों के आने का सिलसिला शुरू हुआ था। नेत्र चिकित्सकों की संस्था भारतीय नेत्र संगठन (इंडियन आप्थोलोमाजिकल सोसाइटी) की ओर से देश के 20 डॉक्टरों की टीम गठित की गई है। डॉक्टर कार्बाइड गन के प्रयोग से लगने वाली चोट आदि का अध्ययन कर रहे हैं।
कार्बाइड अत्यंत ज्वलनशील पदार्थ होता है। कैलशियम कार्बाइड और पानी जब मिल जाता है तो एसिटिलीन गैस बनती है। इससे कहीं भी आग लगने की संभावना अधिक होती है। अगर यह शरीर के किसी अंग पर पड़ जाए तो उसको पूरी तरह जला देगा। आंखें नाजुक होती हैं। इस पर कार्बाइड गैस का ज्यादा प्रभाव पड़ता है।
