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‘नोटा से क्या बदला?’ सुप्रीम कोर्ट की तीखी टिप्पणी से मचा सियासी हड़कंप

सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि क्या विधानसभा और आम चुनावों में नोटा विकल्प के प्रावधान से चुने गए नेताओं की गुणवत्ता में सुधार हुआ है। सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या NOTA बागची की पीठ जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के एक प्रावधान को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इसमें यह तर्क दिया गया था कि यह प्रावधान मतदाताओं को एकल उम्मीदवार की स्थिति में नोटा विकल्प चुनने से रोकता है।

याचिका में मांग की गई थी कि सभी चुनावों में, जिनमें एकल उम्मीदवार वाले चुनाव भी शामिल हैं, नोटा विकल्प को अनिवार्य बनाया जाए। नोटा (उपरोक्त में से कोई नहीं) को 2013 में पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज बनाम, भारत सरकार मामले में ऐतिहासिक फैसले में दिए गए निर्देश के मद्देनजर लागू किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों में नोटा का विकल्प उपलब्ध कराने का निर्देश दिया था।

मंगलवार को संक्षिप्त सुनवाई के दौरान,जस्टिस बागची ते पूछा, क्या नोटा के लागू होने से निर्वाचित नेताओं की गुणवत्ता में सुधार हुआ है? उन्होंने कहा कि नोटा एक व्यवस्था नहीं बन सकता क्योंकि अधिकतम वोट मिलने के बावजूद नोटा एक भी सीट नहीं भर सकता।

मतदान अनिवार्य बनाया जाना चाहिए वोट कम देते हैं संपनन और शिक्षित लोग… पीठ ने यह भी कहा कि अच्छे उम्मीदवारों की जीत सुनिश्चित करने के लिए चुनावों में मतदान को अनिवार्य बनाने का प्रयास किया जाना चाहिए। पीठ ने इस बढ़ती प्रवृत्ति पर भी खेद व्यक्त किया कि शिक्षित और संपन्न मतदाता, अशिक्षित और महिलाओं की तुलना में चुनावों में बहुत कम मतदान करते हैं। पीठ ने यह भी कहा कि चुनावों में मतदान को अनिवार्य बनाने का प्रयास किया जाना चाहिए ताकि अच्छे उम्मीदवारों की जीत सुनिश्चित हो सके। अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमानी ने याचिका का विरोध करते हुए कहा, “हम बहुत सारे काल्पनिक आधारों पर विचार कर रहे हैं। इस तरह कानून की परीक्षा नहीं ली जा सकती। अब सुनवाई 17 मार्च को होगी।

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