नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट इस बात की जांच करेगा कि क्या लंबित विधेयकों पर तमिलनाडु के राज्यपाल के मामाले में 8 अप्रैल के शीर्ष अदालत का निर्णय केरल के मामले पर भी लागू होता है या कोई अंतर है। दरअसल, केंद्र ने मंगलवार को बताया कि तमिलनाडु के राज्यपाल के मामले दिए फैसले में केरल सरकार की ओर से दायर समान याचिका के तथ्यों को शामिल नहीं किया गया है। केरल सरकार ने भी राज्यपाल के विधेयकों को मंजूरी देने में देरी पर सवाल उठाया है। जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने तमिलनाडु के फैसले का अध्ययन करने के लिए समय मांगने के बाद मामले पर विचार के लिए 6 मई की तारीख तय की है। मेहता ने कहा कि यह केरल के मामले को कवर नहीं करता है। अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी ने भी कहा कि तमिलनाडु का फैसला तथ्यों के आधार पर तत्काल मामलों के कुछ मुद्दों को कवर नहीं करता है। उन्होंने कहा. हम उन अंतरों को दिखाना चाहेंगे। केरल सरकार के वकील केके वेणुगोपाल ने कहा कि मामला तमिलनाडु मामले में हाल ही में दिए गाए फैसले के अंतर्गत आता है। मुददा यह है कि राष्ट्रपति को संदर्भित करने की समय सीमा क्या है, जिसे तीन महीने का माना गया है। उन्होंने बताया कि यह केंद्र सरकार की ओर से जारी परिपत्र के अनुसार है। इसके बाद पीठ ने वेणुगोपाल से पूछा कि वह क्या प्रस्ताव रखते हैं और क्या वह याचिका वापस लेना चाहते हैं क्योंकि वह निर्णय वहां है। सॉलिसिटर जनरल मेहता ने कहा कि उस निर्णय के सवाल पर वह निर्णय की जांच कर रहे हैं और इस उद्देश्य के लिए कुछ समय दिया जा सकता है। इसके बाद वेणुगोपाल ने कहा कि सॉलिसिटर जनरल को यह स्पष्ट करना होगा कि यह सीधे तौर पर शामिल है या नहीं। इस पर मेहता ने कहा कि यह शामिल नहीं है। पीठ ने कहा कि एकमात्र सवाल यह देखना है कि क्या निर्णय मौजूदा मामले को कवर नहीं करता है।
