नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का मूल्य समझना चाहिए और इस अधिकार का इस्तेमाल करते समय आत्म-संयम बरतना चाहिए। शीर्ष कोर्ट ने संकेत दिया कि सोशल मीडिया पर नफरती और आपत्तिजनक संदेशों को नियंत्रित करने के लिए वह दिशा-निर्देश जारी करने पर विचार कर रहा है। पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 19 (2) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंधों को रेखांकित करते हुए कहा, ये प्रतिबंध उचित रूप से लगाए गए हैं। अगर लोग संयम नहीं बरतेंगे, तो सरकार हस्तक्षेप करेगी।जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने कहा, भारत की एकता व अखंडता को बनाए रखना मौलिक कर्तव्यों में से एक है। मगर इसका उल्लंघन किया जा रहा है। कम-से-कम सोशल मीडिया पर विभाजनकारी प्रवृत्तियों पर अंकुशलगाया जाना चाहिए। सरकार किस हद तक अंकुश लगा सकती है? नागरिक स्वयं को नियंत्रित क्यों नहीं कर सकते? उन्हें इस आजादी का मूल्य पता होना चाहिए। अगर वे ऐसा नहीं करेंगे, तो सरकार हस्तक्षेप करेगी और कौन चाहता है कि सरकार हस्तक्षेपकरे? कोई नहीं चाहता। जस्टिस केवी विश्वनाथन ने कहा, नागरिकों के बीच भाईचारा होना चाहिए, तभी नफरत खत्म हो पाएगी। जस्टिस नागरत्ना ने कहा, यदि नागरिक बोलने और अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकार का आनंद लेना चाहते हैं, तो यह उचित प्रतिबंधों के साथ होना चाहिए।
पीठ वजाहत खान नामक व्यक्ति की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। खान के खिलाफ प. बंगाल, असम, महाराष्ट्र और हरियाणा सहित कई राज्यों में हिंदू देवता के खिलाफ आपत्तिजनक पोस्ट करने के लिए एफआईआर दर्ज की गई है। 23 जून सोमवार को आगे बढ़ा दिया। को शीर्ष अदालत ने खान को 14 जुलाई तक दंडात्मक कार्रवाई से अंतरिम सुरक्षा प्रदान की थी,
