प्रयागराज। कविता और एकांकी लेखन के पुरोधा डॉ. राम कुमार वर्मा का इंद्र पर महाकाव्य लिखने का संकल्प अधूरा रह गया। शायद’ यही कारण है कि प्रयाग स्ट्रीट के बंगला नंबर चार साकेत में अब सन्नाटा है। ये किसी पुस्तक के अंश नहीं बल्कि सांस्कृतिक विरासत संभाल रहीं बेटी डॉ. राज लक्ष्मी वर्मा की पिता से जुड़ीं यादों का हिस्सा है। डॉ. राजलक्ष्मी वर्मा। उनकी इविवि में संस्कृत विभाग में रहीं डॉ. राजलक्ष्मी वर्मा देश-विदेश में विख्यात डॉ. राम कुमार वर्मा की इकलौती संतान हैं। उन्होंते रुंधे गले से बताया कि कोई ऐसा दिन नहीं होता था जब पिताजी लॉन में न बैठते हों। यही नहीं नियमित लेखन उनकी दिनचर्या में शामिल था। कहा कि पिताजी जिंदादिल थे। लेखन, वागवानी के साथ रामायण पढ़ना उनके लिए किसी टॉनिक से कम नहीं था।वर्ष 1990 में पांच अक्तूबर का वह दिन याद है जब पिताजी ने बेचैनी की शिकायत की तो मैं उन्हें पारिवारिक चिकित्सक और उनके मित्र डॉ. जेबी बनर्जी के लूकरगंज स्थित नर्सिंग होम में ले गई थी। वहीं उन्होंने कहा, बेटा स्वस्थ करके साथ घर ले चलो। मुझे इंद्र महाकाव्य लिखने का संकल्प पूरा करना हैफिर उन्होंने पान लाने को कहा। वह घर में ही पान लगाकर खाते थे। उस दिन पान का डिब्बा उनके पास नहीं था। किसी तरह उन्हें पान न खाने के लिए मना लिया था।
-डॉ. राजलक्ष्मी वर्मा ने बताया कि इस बीच पिताजी ने दो-चार पंक्तियां लिखीं, फिर उनके चेहरे पर पीड़ा के भाव दिखे। पूछने पर कहा, बेटाबेचैनी हो रही है। हम दौड़कर डॉक्टर अंकल को बुलाने गए। वहां पहुंचे तो उनका शरीर शांत हो चुका था। यह मेरे लिए वज्रपात जैसा था। हमने खुद को संभाला और पिता की विरासत को संजोने का बीड़ा उठाया। अब उनके नाम से ट्रस्ट है जिसके माध्यम से भाषा, लेखन संबंधी कार्य हो रहे हैं।
