माघ मेला धार्मिक और आध्यात्मिक संदेशों के साथ सामाजिक सरकारों का माध्यम बन रहा है। संत समाज और कथावाचक मेले को स्वच्छ और व्यवस्थित स्वरूप देने के साथ प्रदूषण से भी मुक्त रखने का प्रयास कर रहे हैं। साधु-संतों के शिविर में धर्माचार्यों ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि पंडाल में पॉलिथीन के कप और थैलियों का इस्तेमाल नहीं होगा।
कुल्हड़ और दोना-पत्तल के उपयोग पर जोर : मेले में खाने-पीने की 3000 से अधिक छोटी-बड़ी दुकानें हैं। सबसे अधिक 1700 दुकानें चाय और नाश्ते की हैं। यहां चाय के लिए कुल्हड़ और नाश्ते के लिए दोना-पत्तल का इस्तेमाल हो रहा है। त्रिवेणी मार्ग पर चाय-नाश्ते की दुकान चलाने वाले रघुवीर प्रसाद कहते हैं कि लोगों में जागरूकता आई है।
लोग खुद ही के कुल्हड़ में चाय पीना पसंद करते हैं। माघ मेला अधिकारी ऋषिराज बताते हैं कि क्षेत्र में 4500 से अधिक संस्थाओं के शिविर लगे हैं। इसमें से ज्यादातर ने बांस और लकड़ी से बने शिविर और प्रवेश द्वार निर्माण को प्राथमिकता दी है। खाक चौक में योगी मुद्रा में भव्य शिविर का निर्माण करा रहे श्री रामानंदाचार्य मठ शिविर के महामंडलेश्वर स्वामी बृजभूषण दास महाराज का कहना है कि बांस और लकड़ी से बने शिविर हमारी संस्कृति में पवित्रता का भाव प्रस्तुत करते हैं।
