राजधानी में स्वास्थ्य सेवाओं की बेहतर उपलब्धता के बावजूद गर्भपात के हर दूसरे मामले में असुरक्षित तरीकों का इस्तेमाल हो रहा है। केजीएमयू के अध्ययन के अनुसार महिलाओं और युवतियों में बिना डॉक्टरी सलाह मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (एमटीपी) का चलन तेजी से बढ़ा है। यह अध्ययन जर्नल ऑफ फैमिली मेडिसिन एंड प्राइमरी केयर के ताजा अंक में प्रकाशित हुआ है।
यह अध्ययन डॉ. श्रुति सिंह, डॉ. मोनिका अग्रवाल, डॉ. अंजू अग्रवाल और डॉ. अनीश खन्ना ने किया है। केजीएमयू के स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग की ओपीडी में आने वाली उन महिलाओं और युवतियों को इसमें शामिल किया गया जिनका पिछले पांच साल की अवधि में एक से ज्यादा बार गर्भपात हुआ था। इनकी उम्र 15 से 49 वर्ष के बीच थी।
इसमें पाया गया कि 47.5 फीसदी ने गैर-सुविधागत केंद्रों में एमटीपी किट के माध्यम से गर्भपात कराया। लगभग आधे (48%) प्रतिभागियों की प्रसव संख्या एक या दो थी और 11 फीसदी ने अभी तक बच्चे को जन्म नहीं दिया था। हर पांचवे प्रतिभागी की कोई बेटी नहीं थी और हर छह में से एक की सभी संतान बेटियां हीं थीं।
क्या कहता है कानून : चिकित्सा गर्भपात अधिनियम के अनुसार एक डॉक्टर की अनुमति से 20 सप्ताह तक और कुछ सप्ताह तक कानूनी रूप से गुर्भपात कराया जा सकता है। इसमें अविवाहित युवतियों भी शामिल हैं।
सुविधा नहीं गर्भपात को समझें मजबूरी, हो सकता है खतरा : गर्भपात को सुविधा के रूप में नहीं लेना चाहिए। अगर बच्चा नहीं चाहिए तो गर्भनिरोधक साधनों का इस्तेमाल करें। इसके बावजूद अगर गर्भ ठहर गया तो फिर अपने आप किट के बजाय गर्भपात करने के लिए डॉक्टर की सलाह में। -प्रो. अंजू अग्रवाल, विभागाध्यक्ष- स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग केजीएमयू ।
