नई दिल्ली। करोड़ों की अधजली नकदी पकड़े जाने के बाद चर्चा में आए जस्टिस यशवंत वर्मा के पास महाभियोग प्रस्ताव के जरिये हटाए जाने से बचने के लिए इस्तीफा ही एकमात्र विकल्प है। सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति व हटाने की प्रक्रिया से अवगत विशेषज्ञों ने बताया कि किसी भी सदन में सांसदों के समक्ष अपना पक्ष रखते हुए जस्टिस वर्मा इस्तीफे की घोषणा भी कर सकते हैं। उनके मौखिक बयान को उनका इस्तीफा मान लिया जाएगा।
विशेषज्ञों ने कहा, इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज, जस्टिस वर्मा इस्तीफा देने का फैसला करते हैं, तो उन्हें सेवानिवृत्ति के बाद हाईकोर्ट जजों के लिए तय पेंशन व अन्य लाभ मिलेंगे। यदि संसद की ओर से महाभियोग के जरिये हटाया जाता है, तो वह इन सभी लाभों से वंचित हो जाएंगे।
संविधान के अनुच्छेद 217 के अनुसार, हाईकोर्ट के जज राष्ट्रपति को संबोधित त्यागपत्र के जरिये पद छोड़ सकते हैं।न्यायाधीश के इस्तीफे के लिए किसी अनुमोदन की जरूरत नहीं होती है। नियमों के अनुसार, कोई जज पद छोड़ने के लिए खास तिथि बता सकता है। हालांकि, वह इस्तीफा वापस भी ले सकता है। संसद की ओर से हटाया जाना जज के पद छोड़ने का दूसरा तरीका है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव खन्ना ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर जस्टिस वर्मा को हटाने के लिए कहा था। तत्कालीन सीजेआई खन्ना ने जस्टिस वर्मा को इस्तीफा देने के लिए भी कहा था, लेकिन उन्होंने इन्कार कर दिया था।
संसद का मानसून सत्र 21 जुलाई को शुरू होगा और 12 अगस्त तक चलेगा। इसी दौरान महाभियोग पर फैसला होगा। दिल्ली हाईकोर्ट का जज रहते जस्टिस वर्मा के आवास से अधजली नकदी मिली थी। सुप्रीम कोर्ट की ओर से मामले की जांच के लिए तीन सदस्यीय आंतरिक समिति का गठन किया गया था।
