केंद्रीय सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने डिजिटल कंटेंट के संदर्भ में मंगलवार को दो टूक कहा कि कोई भी कंपनी चाहे वह नेटफ्लिक्स, यूट्यूब, मेटा या एक्स हो सभी को देश के कानूनी ढांचे और संविधान का पालन करना होगा। उन्होंने यह भी कहा कि डीपफेक की समस्या तेजी से बढ़ रही है और बच्चों व समाज की सुरक्षा के लिए इससे निपटने के लिए कहीं अधिक कड़े नियमों की जरूरत है।
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि किसी भी देश में काम करने वाली कंपनी को उस देश के सांविधानिक ढांचे के भीतर ही काम करना होता है। यह एकदम स्पष्ट है। यह एक वैश्विक मानक है। सभी बहुराष्ट्रीय कंपनियां इसे समझती हैं और यह एक स्थापित कानूनी स्थिति भी है। वैष्णव ने कहा कि सांस्कृतिक संदर्भ की बात करें तो बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए उस देश के सांस्कृतिक संदर्भ को समझना बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि एक विशेष सांस्कृतिक संदर्भ से बहुत फर्क पड़ सकता है। जो एक देश में सामान्य है, वह दूसरे देश में प्रतिबंधित हो सकता है। जो एक देश में प्रतिबंधित है, वह दूसरे देश में सामान्य हो सकता है। इसलिए यह महत्वपूर्ण है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियां उस देश के सांस्कृतिक संदर्भ के भीतर ही काम करें, और अधिकांश कंपनियां ऐसा करने का प्रयास करती हैं। इस प्रक्रिया में हमेशा कुछ न कुछ सीखने को मिलता है।
डीपफेक : और सख्त नियम होंगे : वैष्णव ने पत्रकारों से बातचीत के दौरान बताया कि डीपफेक और उम्र आधारित प्रतिबंधों पर सोशल मीडिया मंचों के साथ बातचीत जारी है, ताकि इस मुद्दे पर सबसे उपयुक्त तरीके से निपटा जा सके। डीपफेक एआई से तैयार की गई ऐसी तस्वीरें व वीडियो होते हैं जो नकली होने के बावजूद असली प्रतीत होती हैं। उन्होंने कहा कि इस पर और भी सख्त नियम की आवश्यकता है।
इस मुद्दे पर संसद की सूचना प्रौद्योगिकी समिति ने भी अध्ययन किया है और कुछ सिफारिशें की हैं। इसलिए निश्चित तौर पर मेरा मानना है कि हमें डीपफेक पर और भी सख्त नियमन की आवश्यकता है। हमें संसद के भीतर इस बात पर आम सहमति बनानी चाहिए कि डीपफेक पर इतने सख्त प्रतिबंध लगाए की जाएं ताकि समाज को इन हानिकारक तत्वों से बचाया जा सके।
