धरती को जलवायु संकट से बचाने वाली सबसे बड़ी प्राकृतिक ढाल महासागर अब खुद खतरे में हैं। एक नए अध्ययन ने चेताया है कि माइक्रोप्लास्टिक महासागरों की कार्बन सोखने की क्षमता को कमजोर कर रहे हैं। इससे न केवल ग्लोबल वॉर्मिंग तेज हो सकती है, बल्कि समुद्री पारिस्थितिकी, मछली उत्पादन और करोड़ों लोगों की आजीविका पर भी असर पड़ने की आशंका है।
महासागर पृथ्वी के सबसे बड़े कार्बन सिंक माने जाते हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, इंसानी गतिविधियों से उत्सर्जित कुल कार्बन डाइऑक्साइड का करीब 30 फीसदी हिस्सा महासागर अब तक अपने भीतर समेट चुके हैं। इसके साथ ही महासागर ऑक्सीजन का भी सबसे बड़ा स्रोत हैं, जो पृथ्वी के तापमान संतुलन और जीवन के लिए अनिवार्य है। यही वजह है कि इन्हें जलवायु परिवर्तन के खिलाफ
धरती की सबसे बड़ी प्राकृतिक सुरक्षा ढाल माना जाता है। यह अध्ययन यूनिवर्सिटी ऑफ शारजाह, द एजुकेशन यूनिवर्सिटी ऑफ हांगकांग, बीजिंग नार्मल यूनिवर्सिटी और पेशावर विश्वविद्यालय से जुड़े शोधकर्ताओं ने किया है।
इसके नतीजे जर्नल ऑफ हैजर्डस मैटेरियल्स : प्लास्टिक्स में प्रकाशित हुए हैं। अध्ययन से जुड़े शोधकर्ता डॉ. इहसानुल्लाह ओबैदुल्लाह के मुताबिक महासागरों में कार्बन जमा होने की एक अहम प्रक्रिया जैविक कार्बन पंप कहलाती है। समुद्र की सतह पर मौजूद फाइटोप्लैंकटन सूर्य के प्रकाश से भोजन बनाते हैं। और इस प्रक्रिया में कार्बन डाइऑक्साइड को सोख लेते हैं। बाद में जब ये सूक्ष्म पौधे मरते हैं या जूप्लैंकटन व अन्य समुद्री जीव इन्हें खाते हैं, तो इनमें जमा कार्बन उनके शरीर, मल या अवशेषों के साथ समुद्र की गहराइयों में चला जाता है, जहां यह सैकड़ों से हजारों साल तक कैद रह सकता है।
अध्ययन में सामने आया है कि माइक्रो प्लास्टिक फाइटोप्लैंकटन की प्रकाश-संश्लेषण क्षमता को घटा देते हैं और जूप्लैंकटन के चयापचय को भी नुकसान पहुंचाते हैं। इसका सीधा नतीजा यह होता है कि जैविक कार्बन पंप कमजोर पड़ता है और महासागरों की कार्बन सोखने की क्षमता घटने लगती है
इंसानी शरीर तक पहुंचा… माइक्रोप्लास्टिक समुद्र की गहराइयों से लेकर आर्कटिक की बर्फ, मिट्टी, हवा, पानी, बादल, ग्लेशियर और मानव शरीर तक में पाए जा रहे हैं। चिंता की बात यह है कि माइक्रोप्लास्टिक अपने साथ जहरीले रसायन भी ढोते हैं, जो इंसानों और अन्य जीवों में पहुंचकर स्वास्थ्य जोखिम बढ़ाते हैं।
