प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट के सामने उत्तर प्रदेश राज्य औद्योगिक विकास प्राधिकरण (यूपीसीडा) का एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है। प्राधिकरण ने एक फर्म को उद्योग लगाने के लिए ऐसा प्लॉट आवंटित किया जो मौके पर था ही नहीं। 23 साल बाद जब फर्म ने न्याय के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया तो अधिकारियों की लापरवाही सामने आई। इस पर कोर्ट ने यूपीसीडा पर 10 लाख रुपये का मुआवजा लगाया। यह आदेश न्यायमूर्ति एमके गुप्ता और न्यायमूर्ति अनीस कुमार गुप्ता की खंडपीठ ने हापुड़ जिले की मेसर्स शांति लाल अरुण कुमार साझीदार फर्म की याचिका पर दिया।
यूपीसीडा ने 16 जनवरी 2001 को मोहम्मद शकीबुद्दीन को 742.5 वर्गमीटर का एक प्लॉट आवंटित किया था। इस प्लॉट को याची फर्म ने प्राधिकरण की अनुमति से 250 रुपये लेवी शुल्क जमा कर सात जनवरी 2009 को खरीदा था। 50 महीने तक कब्जा नहीं लेने पर प्राधिकरण के क्षेत्रीय प्रबंधक ने फर्म को 13,034 रुपये जमा करने या प्लॉट निरस्त करने की चेतावनी दी। जवाब में फर्म ने प्राधिकरण को सूचित किया कि अप्रोच रोड न होने के कारण प्लॉट तक पहुंचना मुश्किल है और उद्योग नहीं लग सकता। ऐसे में फर्म ने सड़क बनाने की मांग की।ने जब कनिष्ठ अभियंता को सड़क बनाने के लिए कहा गया तो पता चला कि मौके पर न तो कोई प्लॉट है और न ही कोई सड़क ।
