महिला सशक्तीकरण कभी भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए महज एक नारा भर नहीं रहा, यह वास्तव में उन मूल्यों का प्रतिबिंव है, जिनका पालन उन्होंने जीवन भर किया है। उन्होंने अपनी मां के संघर्षों को देखा और उनके मूल्यों से सीखा। आरएसएस के एक प्रचारक से लेकर देश के प्रधानमंत्री के तौर पर मोदी ने यह सुनिश्चित किया है कि महिलाएं न केवल भागीदार बने, बल्कि विकसित भारत को आकार देने में अग्रणी भूमिका भी निभाएं।
बात चाहे महिलाओं को राजनीति में आगे लाने की हो, चुनावों में उनका प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने की हो या आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने की हो, मोदी का दृष्टिकोण महिलाओं के नेतृत्व वाले विकास में निहित रहा है। मेरे सहित कई लोगों को याद है कि कैसे उन्होंने लगातार पार्टी के विभिन्न निकायों में महिलाओं को ज्यादा प्रतिनिधित्व देने की हिमायत की। बड़ौदा में पार्टी की कार्यसमिति की बैठक में उन्होंने पार्टी के संगठनात्मक ढांचे में महिलाओं के लिए 30 प्रतिशत आरक्षण सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उनकी नजर में महिला सदस्यों के बिना एक बूथ समिति भी अधूरी ही थी।
■ जब कारगिल शहीद की पत्नी को दिलवाया लोकसभा का टिकट
राजनीति में महिलाओं को आगे बढ़ाने से संबंधित मोदी की पहल के कई उदाहरण हैं। चाहे बात गुजरात में 2009 के लोकसभा चुनावों में महिला उम्मीदवारों की हिस्सेदारी सुनिश्चित करने की हो या 1999 में हरियाणा से सांसद पद के लिए भाजपा के उम्मीदवार के रूप में कारगिल युद्ध में शहीद की पत्नी सुधा यादव को चुनने की हो या फिर हाल ही में दिल्ली के लिए महिला मुख्यमंत्री की नियुक्ति की हो। नरेंद्र मोदी ने हमेशा से ही महिलाओं को स्वाभाविक संगठनकर्ता और संभावित राजनीतिक नेता के तौर पर देखा है। उनके विचार में, महिलाओं का नेतृत्व हर जगह मौजूद हैं, इसे बस मान्यता मिलने का इंतजार होता है।
■ महिलाओं की नेतृत्वकर्ता की भूमिका को सुनिश्चित किया
गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में समरस गांव-तहसील पहल के तहत मोदी ने सुनिश्चित किया कि गांवों और नगरपालिका क्षेत्रों में पूरी प्रशासनिक इकाई-पटवारी से लेकर पुलिस अधिकारी तक का नेतृत्व महिलाओं के हाथों में हो। यह केवल प्रतीकात्मक ही नहीं, बल्कि प्रणालीगत सशक्तीकरण की दिशा में भी एक कदम था। महिलाओं के नेतृत्व को केवल आरक्षण पर नहीं बल्कि योग्यता पर आधारित होने की बात पर जोर देते हुए, उन्होंने नगर निकायों में, यहां तक कि अनारक्षित निर्वाचन क्षेत्रों में भी, महिलाओं को महापौर, उप महापौर, स्थायी समिति अध्यक्ष और सदन के नेता के रूप में सक्रिय रूप से बढ़ावा दिया। बतौर मुख्यमंत्री मोदी ने गुजरात में सरपंच पति की प्रथा को जड़ से समाप्त कर दिया। उन्होंने महिला सरपंचों से मुलाकात कर खुद कामकाज संभालने के लिए प्रोत्साहित किया।
■ जीत के बाद दलित लड़की का शंकराचार्य से कराया सम्मान
1987 में भाजपा पहली बार अहमदाबाद नगर निगम का चुनाव जीती, तो पार्टी के राज्य संगठन महासचिव मोदी ने विजयोत्सव समारोह में पीएचडी हासिल करने वाली एक दलित लड़की का शंकराचार्य द्वारा सम्मान करवाया। जब पहली बार गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में आधिकारिक आवास में कदम रखा, तो कलश स्थापना के लिए एक दलित लड़की को आमंत्रित किया।
महिलाओं के समग्र उत्थान के लिए शुरू की कई योजनाएं
2005 में, गुजरात में कन्या भ्रूण हत्या समाप्त करने के उद्देश्य से ‘बेटी बढ़ाओ’ मिशन शुरू किया गया। शिक्षा को सशक्तीकरण का साधन मानने के प्रति मोदी के दृढ़ विश्वास ने 2003 में कन्या केलवणी’ कार्यक्रम को जन्म दिया। 2006 में, मोदी ने गुजरात में महिलाओं की सुरक्षा, स्वास्थ्य, आर्थिक सुरक्षा एवं सामाजिक सशक्तीकरण पर केंद्रित नारी गौरव नीति की शुरुआत की। इसके तहत घरेलू हिंसा से बचकर निकली महिलाओं की सहायता के लिए महिला सुरक्षा समितियों की स्थापना की गई और कानूनी सहायता प्रदान करने के लिए नारी अदालतें बनाई गईं। 2009 में, गुजरात ने स्थानीय शासन में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण प्रदान करने वाला ऐतिहासिक विधेयक पारित किया। कच्छ के भूकंप के पुनर्वास के दौरान भी, नवनिर्मित घरों के पंजीकरण को पति एवं पत्नी दोनों के नाम पर अनिवार्य करके समानता सुनिश्चित की। चिरंजीवी योजना का उद्देश्य संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देकर मातृ एवं शिशु मृत्यु दर को कम करना था। खिलखिलाहट एंबुलेंस सेवा ने गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं के लिए निःशुल्क परिवहन की पेशकश की। वंचित महिलाओं को स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने के लिए मुख्यमंत्री अमृतम योजना शुरू की गई। सखी मंडलों ने सूक्ष्म वित्तीय गतिविधियों और कौशल प्रशिक्षणु में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
• लैंगिक संतुलन के लिए हुई बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ की शुरुआत
मोदी ने 2014 में प्रधानमंत्री का पदभार संभाला, तो नारी शक्ति के प्रति उनकी प्रतिवद्धता आर्थिक, सामाजिक, शैक्षिक एवं राजनीतिक क्षेत्रों में उन्हें सशक्त बनाने के उद्देश्य से राष्ट्रव्यापी नीतियों में रूपांतरित हो गई। उनका दृष्टिकोण कल्याणकारी कार्यक्रमों से आगे बढ़कर अवसर सृजित करने, क्षमता निर्माण करने और सभी क्षेत्रों में महिला नेतृत्व को बढ़ावा देने पर केन्द्रित हो गया। लैंगिक असंतुलन को दूर करने और बालिका शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ की शुरुआत की गई। सुकन्या समृद्धि योजना, प्रधानमंत्री मातृ वंदन योजना, स्टैंड-अप इंडिया, लखपति दीदी कार्यक्रम, पोषण अभियान, मिशन शक्ति जैसी कई योजनाओं को भी अपनाया गया। प्रधानमंत्री आवास योजना जैसी पहल महिलाओं के लिए लाभकारी साबित हुई। इस महिला दिवस पर मिलकर नारी शक्ति की परिवर्तनकारी यात्रा का उत्सव मनाएं, जो देश की प्रगति को विकसित भारत 2047 की दिशा में ले जा रही है।
