इंटरनेट के युग में पुस्तकों की अहमियत कम नहीं है। संगमनगरी के पुस्तकालयों में जर्मनी, लंदन, पोलैंड, ऑस्ट्रेलिया से भी शोधार्थी आ रहे हैं। उनका मनना है कि ऑनलाइन माध्यम प्रकाशित पुस्तकों का विकल्प नहीं हो सकता।
हिंदी साहित्य सम्मेलन स्थित हिंदी संग्रहालय के प्रभारी दुर्गानंद शर्मा ने बताया कि यहां करीब एक लाख से अधिक किताबें हैं। इनमें से 75 हजार किताबें सिर्फ हिंदी की हैं। यहां आम पाठक नहीं, शोधार्थी आते हैं। विदेशों से आने वाले शोधार्थी साहित्य, कला संस्कृति की पुस्तकों सरस्वती, हंस, धर्मयुग, दिनमान, साप्ताहिक हिंदुस्तानी, माधुरी, आजकल, आर्य महिला, विशाल भारत, वीणा, सुधा, चांद, साहित्य संदेश, दीदी, नई कहानियां, मर्यादा, गीता, धर्म, माया, कल्पना आलोचना, सम्मेलन पत्रिका आदि से संदर्भ प्राप्त करते हैं।
24 फरवरी 2025 को पोलैंड से प्रो. दानुता स्ताशिक गोस्वामी तुलसीदास की रचित बरवै रामायण की हस्तलिखित पांडुलिपि, 15वीं सदी के अवधी कवि ईश्वरदास की दुर्लभपुस्तक अंगद पैज और स्वर्गा रोहिणी कथा पर शोध संदर्भ प्राप्त करने के लिए संग्रहालय आईं थीं।
पिछले दो वर्षों में हंगरी से वैंत्सै फुस्टोस, लंदन से फ्रंचेस्का ओर्सीनी व मैलिना ग्रैवियर, जर्मनी से फ्रांसेस्का लूनारी, निकलैस फोयडल, जस्टिना कुरोस्का ने हिंदी संग्रहालय में आकर अध्ययन किया।
हिंदुस्तानी एकेडेमी के पुस्तकालयाध्यक्ष रतन पांडेय बताते हैं कि जर्मनी, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया से आकर शोधार्थियों ने शोध संदर्भप्राप्त किया है। यहां लगभग 30 हजार से अधिक किताबें हैं। वहीं, किताबें डिजिटलाइज्ड भी की गई हैं।
केंद्रीय राज्य पुस्तकालय की रूशी श्रीवास्तव ने बताया कि एक बाल पुस्तकालय भी है, जिसमें बालोपयोगी पुस्तकें और पत्रिकाएं संग्रहित हैं। राजकीय पब्लिक लाइब्रेरी की स्थापना 1864 में की गई थी। पुस्तकालय में 1.25 लाख से अधिक किताबें, मैगजीन, अखबार, पांडुलिपियां आदि शामिल हैं।
