चित्रकूट। जगद्गुरु रामभद्राचार्य ने कहा है कि एक आचार्य होने के नाते मैं सबको कहता हूं, संस्कृत का अध्ययन करना चाहिए और प्रत्येक हिन्दू को संस्कृत पढ़ना चाहिए। प्रेमानंद जी पर मैंने कोई टिप्पणी नहीं की है में चमत्कार को नमस्कार नहीं करता हूं। भारत की दो प्रतिष्ठाएं हैं संस्कृति और समस्कृति, संस्कृति को पढ़ने के लिए समस्कृति की नितांत आवश्यकता है।विधर्मी शक्तियां सनातन धर्म को निर्बल बनाने के लिए बातों को तोड़ मरोड़ कर पेश करती हैं। संतों में भेद डालती हैं सभी संतों को एक हो जाना चाहिए। मेरे लिए जो भ्रम फैलाया जा रहा है वह गलत मैंने कोई टिप्पणी नहीं की, जब भी प्रेमानंद जी मुझसे मिलने आएंगे मैं आशीर्वाद दूंगा औरहृदय से लगाऊंगा ।इससे पूर्व जगदगुरु के उत्तराधिकारी आचार्य रामचंद्र दास ने मीडिया को बताया कि जगद्गुरु के बयान को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत किया है। चित्रकूट तुलसी पीठ से स्पष्ट संदेश दिया गया है कि उन्हें (जगद्गुरु रामभद्राचार्य) प्रेमानंद महाराज से किसी भी प्रकार की ईर्ष्या नहीं है। बल्कि उन्होंने प्रेमानंद को नाम जापक संत व पुत्र समान कहाहै। आचार्य ने कहा कि भगवान का नाम जपने वाला हर व्यक्ति सम्मान के योग्य होता है। जगदगुरु विशेष पूजन में व्यस्त हैं। कहा कि आज कल चैनल अपनी टीआर के लिए संतों की बातों को तोड़-मरोड़ कर ‘पेश कर रहे हैं। इससे श्रद्धालुओं के मन में भ्रम फैलता है।जगद्गुरु रामभद्राचार्य की टिप्पणी धर्मनगरी के साधु-संतों ने रामघाट परिसर में बैठक कर जगद्गुरु के बयान का बचाव करने का प्रयास किया। दिगंबर अखाड़े के महंत दिव्य जीवन दास ने कहा कि जगद्गुरु ने मीडिया में जो भी बयान दिया है वह किसी की भावना को ठेस पहुंचाने के लिए नहीं है। उन्होंने गुरु शिष्य की भावना से कही।
मथुरा। श्री तुलसीपीठाधीश्वर जगद्गुरू रामभद्राचार्य महाराज के संत प्रेमानंद को चुनौती देने पर संत समाज अपनी तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहा है। वृंदावन के कई संतों और प्रेमानंद के अनुयायियों का कहना है कि प्रेमानंद रसिक परंपरा के संत हैं। वह रसोपासना करते हैं जिसका मानक कोई भाषा गा विद्वता नहीं है। उसका एक ही भाव है और वह है राधा चरण प्रधान उपासना। रामभद्राचार्य को यह समझना चाहिए।
रामभद्राचार्य ने कहा था कि प्रेमानंद महाराज न तो विद्वान हैं और न ही चमत्कारी। यह मेरे सामने संस्कृत बोलकर दिखाएं और मेरे श्लोकों के अर्थ समझा दें। यह तो इस अवस्था में मेरे बालक के समान हैं। राधा वल्लभसंप्रदाय के विद्वान डा. चंद्रप्रकाश शर्मा हित किंकर कहते हैं संत प्रेमानंद रसोपासना में दीक्षित संत हैं। वह उस संतों की उस त्रिवेणी परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं जिसमें केवल राधा नाम की रण उपासना को ही सर्वोपरि माना गया है। गोस्वामी हित हरिवंश महाप्रभु स्वामी हरिदास और स्वामी हरिराम व्यास जी की इस रसोपासना परंपरा में साधन को साध्य नहीं बल्कि कृपा साध्य माना गया है। इस उपासना के संत किसी को प्रभु पाने का साधन जैसे ये करो या वा कर लो नहीं बताते हैं। केवल कृपा की बात करते हैं।
