लखनऊ। राज्य में इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण को बढ़ावा देने और निवेश आकर्षित करने के लिए उप्र. इलेक्ट्रॉनिक्स घटक विनिर्माण नीति-2025 को कैबिनेट ने मंजूरी दे दी है। इस नीति का मकसद प्रदेश को सिर्फ इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादों की असेंबलिंग सेंटर तक सीमित नहीं करना है, बल्कि इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट्स निर्माण के गढ़ के रूप में विकसित करना है। नीति के प्रस्तावित प्रोत्साहनों और रियायतों की अवधि में करीब 50 हजार करोड़ रुपये का निवेश आने का अनुमान है। इससे बड़ी संख्या में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे।आईटी एवं इलेक्ट्रॉनिक्स विभाग के प्रमुख सचिव अनुराग यादव ने बताया कि अभी यहां ज्यादातर इलेक्ट्रॉनिक्स उपकरण असेंबल होते हैं। इसके पार्ट बाहर से आते हैं। अब हम पार्ट्स को भी यूपी में बनाएंगे। पहले चरण में 11 महंगे कंपोनेंट्स बनाने पर फोकस होगा। इनका इस्तेमाल टीवी, मोबाइल फोन, लैपटॉप सहित अन्य उत्पादों में होता है। अब इन्हें ग्लोबल वैल्यू चैन ऑफ इलेक्ट्रॉनिक्स के तहत यूपी में बनाया जाएगा। इनमें प्रमुख रूप से डिस्प्ले मॉड्यूल, कैमरा मिडिल, इलेक्ट्रो मैग्नेटिक कम्पोनेंट्स, बैटरी सेल 10000 एमएच तक, पॉली कार्बोनेट से बनने वाले कवर, इनक्लोजर और इन्हें बनाने वाली मशीनरी आदि प्रमुख हैं।
छह वर्ष के लिए बनी नीति नीति एक अप्रैल 2025 से प्रभावी होगी और छह वर्षों तक लागू रहेगी। इसके क्रियान्वयन की जिम्मेदारी शासन स्तर पर गठित कार्यान्वयन इकाई और राज्य स्तरीय समिति की देखरेख में नोडल संस्था निभाएगी। सरकार का दावा है कि इस नीति से इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण क्षेत्र में आत्मनिर्भरता आएगी। आपूर्ति श्रृंखला मजबूत होगी और नवाचार तथा अनुसंधान को बढ़ावा मिलेगा। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि नीति का क्रियान्वयन प्रभावी ढंग से हुआ तो यूपी इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माण का वैश्विक हब बन सकता है।
प्रमुख सचिव ने बताया कि कंपोनेंट्स के घरेलू उत्पादन से चीन पर निर्भरता कम होगी। उत्पादों की लागत घटेगी। इसका फायदा आम लोगों के साथ वैश्विक बाजार में भी मिलेगा। कंपोनेंट्स बनाने इसलिए भी जरूरी है क्योंकि आठ वर्ष में इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादों के निर्माण और निर्यात में अप्रत्याशित तेजी आई है। दस साल पहले इलेक्ट्रॉनिक्स की दो इकाइयों श्री। आज 300 से ज्यादा हैं। पहले इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण 1.91 लाख करोड़ रुपये था जो आज 11 लाख करोड़ हो गया है। निर्यात 1500 करोड़ से बढ़कर 2 लाख करोड़ हो गया है। इसमें से आधा निर्यात अकेले नोएडा से हो रहा है।
