डोनाल्ड ट्रंप को अमेरिकी राष्ट्रपति बने छह महीने हो गए हैं. लेकिन इन छह महीनों में पूरी दुनिया ने अमेरिकी राष्ट्रपति को हारते हुए देखा है. पहले दौर की टैरिफ वॉर लगभग बेकार रही. यूक्रेन रूस युद्ध रुकवाने को लेकर ट्रंप के सारे दावे घरे रह गए, भारत-पाकिस्तान के बीच सीजफायर करवाने का जश्न ट्रंप को भारी पड़ गया अब ईरान इजराइल वीर भी ट्रंप के समझ से बाहर दिख रहा है. दरअसल, डोनाल्ड ट्रंप ने शुक्रवार को कहा कि वे दो हफ्तों में यह फैसला लेंगे कि अमेरिका, इजराइल और ईरान संघर्ष में शामिल होगा या नहीं. इससे पहले माना जा रहा था कि अमेरिका इस हफ्ते तक इजराइल के साथ संघर्ष में शामिल हो जाएगा. लेकिन ट्रंप के यू-टर्न से जाहिर है कि इजराइल को लड़ाई अकेली ही लड़नी होगी.
फैसला बदलने की वजह एक्सपर्ट्स के मुताबिक, डोनाल्ड ट्रंप के यू-टर्न के कई अहम कारण हैं. अमेरिका के युद्ध में कूदने की स्थिति में 32 देशों का सैन्य संगठन नाटो दूरी बना सकता है जी 7 देशों की बैठक में भी ईरान को लेकर ट्रंप प्लान को सदस्य देशों की मंजूरी नहीं मिल पाई थी चोन व रूस खुलकर ईरान के समर्थन में उतर जाएंगे. नॉर्थ कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन ने गुरुवार को कहा कि इजराइल का सफाया जरूरी है.
ईरान लिबिया न बन जाए ट्रंप को डर है कि अगर ईरान के सुप्रीम लोडर खामेनेई को निशाना बनाया गया तो हालात ‘एक और लिबिया’ जैसे बन सकते हैं. ट्रंप ने बीते दिनों लिबिया की तबाही का जिक्र करते हुए कहा कि वे नहीं चाहते कि ईरान भी 2011 के गद्दाफी के बाद को अराजकता जैसी हालत में चला जाए, यही वजह है कि ट्रंप ने ईरान के न्यूक्लियर ठिकानों पर बमबारी के फैसले को कम से कम दो हफ्तों तक टाल दिया है
