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कहानी मानवीय व्यवहार के खिलाफ — पुराने ब्लाइंड मर्डर केस में तीन दोषमुक्त

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 43 साल पहले हुई हत्या में उम्रकैद की सजा काट रहे तीन कैदियों को  बेगुनाह करार दिया। उन्हें करने का फैसला सुनाते हुए अभियोजन की कहानी पर हैरानी जताई। कहा कि अगर किसी को बताया जाए कि उसके भाई की बेरहमी से पिटाई हो रही है तो क्या वह लंबा रास्ता चुनकर निहत्था तमाशबीन बनने के लिए मौके पर पहुंचेगा।

 

अगर 11 लोग मिलकर हत्या करने पर आमादा हों तो क्या वे एक घंटे तक मारते रहेंगे, ताकि लोग उन्हें देख लें और उनकी पिटाई से सिर्फ 10 चोटें ही आएंगी। इन तल्ख सवालों संग न्यायमूर्ति जेजे मुनीर व न्यायमूर्ति संजीव कुमार की खंडपीठ ने प्रयागराज की सत्र अदालत की ओर से सुनाई गई सजा रद्द कर दी। कहा कि अभियोजन की कहानी न केवल अविश्वसनीय है, बल्कि सामान्य मानवीय व्यवहार के भी विपरीत है। यह एक ब्लाइंड मर्डर है।

पुलिस ने वास्तविक हत्यारे की तलाश के बजाय संदेह और अनुमान के आधार पर आरोप पत्र दाखिल किया। ट्रायल कोर्ट गवाहों व साक्ष्यों के तार्किक परीक्षण में विफल रहा।

 

क्या है मामला :  मामला प्रयागराज के सोरांव थाना क्षेत्र के भदरी गांव का है। राम किशोर ने आठ जुलाई 1982 को एफआईआर दर्ज कराई। आरोप लगाया कि उसका भाई राम दुलारे फसल की रखवाली करने खेत पर गया था। रात करीब एक बजे उसके चाचा पंचम ने बताया कि रेलवे स्टेशन के पास कुछ लोग राम दुलारे को पीट रहे हैं। इसके बाद वह अपने चाचा पंचम और नन्कू (चचेरे भाई) के साथ मौके पर पहुंचा। देखा कि उदय नारायण, दयाराम, जयराम, राम अवध, लाला राम, महारानी दीन, हरीश चंद्र, कल्लू, हरि, अमृत लाल, राम सुंदर प्रधान उर्फ भोला, राम अवध के खेत में राम दुलारे को लात-घूंसे मार रहे थे और डंडों से भी पीट रहे थे। इससे उसकी मौत हो गई। इसके बाद आरोपी भाग गए। जाते वक्त एफआईआर दर्ज कराने पर जान से मारने की धमकी भी दी।

पुलिस ने मामले की विवेचना के बाद सभी 11 आरोपियों के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया। ट्रायल के बाद 1985 में सभी को उम्रकैद की सजा सुनाई गई। इसके खिलाफ सभी ने सजा को हाईकोर्ट ने चुनौती दी। इस दौरान आठ आरोपियों की मौत हो गई। लिहाजा, सभी मृतकों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई खत्म कर दी गई। जबकि, जीवित बचे अमृत लाल, हरीश चंद्र और कल्लू की अपील स्वीकार करते हुए कोर्ट ने उन्हें हत्या के आरोप से बरी कर दिया। कोर्ट ने मृतक के भाई और चाचा की गवाही पर भी गंभीर संदेह जताया। चश्मदीद की गवाही और चिकित्सा साक्ष्य में विरोधाभास है।

 

 

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