
सही मायनों में क्या हुई किसानों की कर्ज माफी?
किसानो की कर्ज माफी लोकतन्त्र की आवश्यकता या बोझ
आज कल समाज में और टीवी में कई बड़े न्यूज चैनलों पर किसानों के कर्ज माफी और उनके विकास को लेकर मुद्दा बना हुआ है | सरकार द्वारा किसानों के लिए कई योजनाएं भी लागू की गई हैं।
ऐसे ही तेलंगाना राज्य द्वारा किसानों के कल्याण हेतु शुरु कि गई "रैतु- बन्धु" योजना तेलंगाना सरकार द्वारा एक सराहनीय कदम है | यह योजना अपने आप में पहला प्रयास है जिसमें किसानों को लाभान्वित किया जा सके | इसी तरह की योजना उड़ीसा सरकार ने अपने राज्यों के किसानों के लिये " कालिया " नाम से शुरु की है | ये योजनाएं किसानों के कर्ज माफी के लिये अच्छा विकल्प हो सकती है |
प्राचीन समय से ही कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ रही है और हमेशा रहेगी | भारत हमेशा से राजनीतिक, भौगोलिक और सांस्कृतिक उथल – पुथल का देश रहा है | प्राचीनकाल से ही कृषि करना भारत की अर्थव्यवस्था के लिए मुख्य रही है।
भौगोलिक रूप से देखा जाए तो भारत में कई प्रकार की मिट्टी पाई जाती है जो कहीं अधिक उपजाऊ है तो कहीं कम उपजाऊ है | कहीं पर महीन है तो कहीं पर कंकड़ – पत्थर | भारत में मानसून भी कृषि की उत्पादन क्षेत्र को प्रभावित करती है | कहीं अधिक वर्षा हो जाती है तो कहीं सूखे की स्थिति बन जाती है | लेकिन यदि आंकड़ों को देखा जाय तो आज भी भारतीय अर्थव्यवस्था का आधार कृषि है बहुसंख्यक लोग( लगभग 57 प्रतिशत )कृषि कार्य में ही लगे हैं इसमें सीमांत किसान कृषि घरेलू उत्पादन का लगभग 20 प्रतिशत भाग प्रदान करती है जिससे देश की 70 प्रतिशत आबादी निर्भर है |
हाल ही में चुनावों के समय में कृषि एवं रोजगार संकट के ऐसे मुद्दे रहे जो कि प्रमुख थे | अनेक राजनीतिक पार्टियों ने अपने चुनावी एजेंडे में किसनों की समस्याओं को समाप्त करने के लिये कृषि ऋण माफी का ऐलान किया जिससे उन्हें राजनीतिक लाभ प्राप्त हो सके , क्या कृषि कर्ज माफी ही किसानों कि समस्याओं का समाधान हो सकता है |
आर्थिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो कर्ज माफी ही कृषि के लिये पर्याप्त नहीं, कर्ज माफी अर्थव्यवस्था पर बोझ की मात्रा को बढा सकता है | पूर्व RBI गर्वनर रघुराम राजन और मुद्रा बैंक की प्रमुख अर्थशास्त्री गोपीनाथ सहित 13 अर्थशास्त्रीयों ने विचार विमर्श किया और कर्ज माफी को उपर्युक्त न मानते हुए अस्वीकार कर दिया |
हमें विदित हो कि भारतीय किसान स्वतन्त्रता से पहले भी शोषित था और आज भी शोषित है क्योंकि किसानों का कहना है कि कृषि से होने वाली आय से किसान भरपेट भोजन नहीं प्राप्त कर सकता | भूतकाल और वर्तमान काल में बस इतना फ़र्क है कि आज किसान स्वतन्त्र होकर भी परतन्त्र ( किसी न किसी प्रकार से बंधा हुआ है। ) और अपने अधिकारों के लिये आज भी लड़ रहा है |
खुशी इस बात की है कि है कि किसान इस लोकतान्त्रिक देश में अपने हक के लिए आवाज तो उठा सकता है।
उल्लेखनीय है हमारे अनेक नेताओं जैसे -- पं जवाहर् लाल नेहरू , महात्मा गांधी ,सरदार पटेल आदि ने परतन्त्र भारत में किसानों कि समस्याओं को उजागर करके उनके आवाजों को बुलन्द किया जिसमें सबसे ज्यादा योगदान महात्मा गांधी जी का " चंपारण सत्याग्रह " रहा | ऐसे ही अनेक आन्दोलन भारत मे होते रहे और आज भी हो रहे हैं | जबकि आज भारत एक स्वतन्त्र लोकतान्त्रिक देश है।
भारतीय कृषि मानसून पर ज्यादा निर्भर है | मानसून की अनियमितता कृषि उत्पादन को प्रभावती करती है , जिस कारण किसान कर्ज के जाल में फंस जाता है | दूसरी तरफ़ उत्पादन हेतु सिंचाई , बीज ,उर्वरक आदि समय पर खरीदने के लिये अनेक किसान साहूकारों , महन्तों जैसे अनौपचारिक क्षेत्रों से ऋण लेकर ब्याज कि बड़ी किस्तों के जाल में फंस जाते हैं |
कोई परेशान है सास – बहू के रिश्तो में ।
किसान परेशान है कर्ज के किश्तों में ।।
वर्तमान में कर्ज किसानों के लिए महत्वपूर्ण समस्या बन गयी है , जिसमें कुछ किसान औपचारिक तथा कुछ किसान अनौपचारिक क्षेत्र से ऋण लेते हैं | एक आम किसान अर्थात् कम जमीन वाला किसान इस ऋण को चुकाने में असमर्थ हो रहा है ,क्योंकि महंगाई के इस दौर में उसे अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये ऋण लेना पड़ रहा है | वह कृषि के आय से अपनी मूलभूत् आवश्यकताओं को पूरा करने में असमर्थ है , क्योंकि आय का एक भाग वह कृषि में ही निवेश कर देता है |
भारत के जनप्रतिनिधि किसानों की समस्याओं के निदान के लिए कर्ज़ माफी का रास्ता अपना रहे हैं, किन्तु क्या वह यह नहीं जानते कि कर्ज़ माफी से उन किसानों को कैसे लाभ मिलेगा जो साहूकारों और जमींदारों जैसे अनौपचारिक क्षेत्र से ऋण प्राप्त करते है । जबकि बड़े किसान या कुछ सीमित किसान ही ऐसे हैं जो औपचारिक तरीके से ऋण लेते हैं । ऐसे में कुछ किसान ही कर्ज़ माफी का लाभ ले पाते हैं ।
भारत का किसान अपनी कम आय के चलते अपने परिवार का भरण-पोषण नहीं कर पाता है जिससे गरीबी , भुखमरी , कुपोषण और अन्य स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं हो रही हैं, जिस कारण किसान आत्महत्या करने को भी मजबूर है । जो कि किसी लोकतांत्रिक देश के लिए शर्म की बात है, कृषि में कम आय होने के कारण आज किसान का बेटा अपने नाम के आगे डॉक्टर या इंजीनियर जैसी डिग्रियां लेना पसंद करता है , जबकि कृषि के प्रति इनका रूझान कम होता जा रहा है।
किसानों का कहना है कि उनकी सबसे बड़ी समस्या है कि उन्हें कृषि उपज का सही मूल्य नहीं मिल पा रहा है । कई बार तो कुछ किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य होने के बाद भी अपनी लागत तक वसूल नही कर पाता है । इसी कारण किसानों के लिए खेती करना घाटे का सौदा बनी हुई है । भारत के किसानों के पिछड़ेपन एवं कम आय के कई कारण हैं--
*किसानों की समस्याएं....*
- कृषि जोत का छोटा आकार
- मानसून पर निर्भरता
- जागरूकता का आभाव
- कृषि शिक्षा का आभाव
- कर्ज़ हेतु अनौपचारिक निर्भरता
- बाजार का आभाव
- उचित मूल्य नही मिलता
- लोक-लुभावक वादे भारत एक लोकतांत्रिक देश है, इसलिए यहाँ की सरकार कर्ज़ माफी पर बल दे रही है जिससे किसान को न्याय मिल सके किन्तु क्या किसानों को मिला यह न्याय । भारत सरकार द्वारा 2022 तक किसानों की आय दोगुना करने का संकल्प लिया गया है , जिसके लिए सरकार अनेक लाभप्रद योजनाएं एवं बजट में वित्तीय प्रावधान भी कर रही है जैसे- किसान समृद्धि संपदा योजना , कामधेनु योजना , कृषि सिंचाई परियोजना , बीज – उर्वरक सब्सिडी, किसान बीमा योजना , ई-मंडी , खाद्य प्रसंस्करण / उद्योग एवं डिजिटल सुविधाएं आदि। जिससे किसानों को राहत मिल सके और कृषि आय में वृद्धि हो सके ।
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रिपोर्ट मुकेश कुमार पाण्डेय
