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माघ मेला में अजब-गजब बाबा! हठयोग साध रहे मौनी संत ने 5.51 करोड़ रुद्राक्ष से बनाया ‘रुद्राक्ष लोक’

शिवत्व का साम्राज्य है, जहां कंकड़-कंकड़ शंकर है। यह महसूस करना है तो चले आइए माघ मेला के सेक्टर-दो के संगम मार्ग पर। पांव पड़ते ही अनुभूति होगी किसी अलौकिक शक्ति की। यहां स्वामी अभय चैतन्य फलाहारी ‘मौनी बाबा’ ने हठयोग साधा है और सृजन किया है एक ‘रुद्राक्ष लोक’ का।

आतंकवाद-महामारी के नाश को ‘आध्यात्मिक कवच’ :  उन्होंने बताया कि 11 फीट ऊंचे 12 ज्योतिर्लिंग साक्षात शिवलोक का आभास कराते हैं, 5.51 करोड़ रुद्राक्षों की शक्ति से निर्मित हैं। इन विग्रहों पर लिपटी सात करोड़ मालाएं और उनकी सुरक्षा में तैनात 11,108 त्रिशूल महज धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि 11 करोड़ पंचाक्षर मंत्रों से अभिमंत्रित एक ऐसा ‘आध्यात्मिक कवच’ है, जिसे आतंकवाद और महामारी जैसी आसुरी शक्तियों के समूल नाश के लिए तैयार किया गया है।

40 किलो भार के 33 हजार रुद्राक्ष धारण करते हैं : सामान्य दिनों में अपने शरीर पर 40 किलो भार के 33 हजार रुद्राक्ष धारण करने वाले मौनी बाबा ने मौनी अमावस्या पर जब अपनी 1645वीं चक्रवर्ती दंडवत परिक्रमा प्रारंभ की तो संगम की धूल उनके माथे का चंदन बन गई। चारों ओर डमरू बजाते भक्त, शंखनाद से गूंजती दिशाएं, लहराते भगवा ध्वज और उनके बीच धूल-बालू में सने बाबा थे। वे जमीन पर लेटकर, लुढ़कते हुए संगम की ओर बढ़ रहे थे। उनका हर एक घुमाव एक मौन पुकार थी- अयोध्या की तर्ज पर काशी और मथुरा के भव्य मंदिरों के निर्माण के लिए एक तपस्वी की जिद।

 

राष्ट्र सांस्कृतिक पुनरुत्था को हठयोग कर रहे :  यह दृश्य हर किसी आकर्षित कर रहा था कि कैसे एक साधु अपनी देह को गलाकर राष्ट्र के सांस्कृतिक पुनरुत्थान के लिए ‘हठयोग’ कर रहे हैं। उन्होंने संगम में शिविलंग के साथ जब स्नान किया। बोले, यह ‘करोड़ों सनातनी सपनों का अभिषेक’ था। बाबा ने यहां आठ दिशाओं और उद्देश्यों को समर्पित विशेष त्रिशूल स्थापित किए हैं। दक्षिण में काला त्रिशूल आतंकवाद के विनाश और बांग्लादेशी हिंदुओं की सुरक्षा के लिए है। लाल त्रिशूल राष्ट्र की अर्थव्यवस्था को विदेशी आक्रांताओं से बचाने हेतु, पीला त्रिशूल राष्ट्र रक्षा के लिए और पश्चिम में श्वेत त्रिशूल ज्ञान-विद्या के प्रसार हेतु लगाया गया है। मंगल, श्री, अनुग्रह और कृपा के लिए भी चार विशेष त्रिशूल रक्षक की भूमिका में हैं।

इस साधना को देते हैं पूर्णता :  बाबा के अनुसार, जैसे भगवान राम ने रावण पर विजय से पूर्व रामेश्वरम की आराधना की थी, वैसे ही यह साधना वैश्विक संकटों के समाधान के लिए है। यहां 27 नक्षत्रों के प्रतीक 27 ध्वज, षड्दर्शन से प्रेरित छह द्वार और प्रत्येक पर विजय-श्री के घंटे लगाए गए हैं। सूर्य की 12 राशियों को समर्पित 12 घंटे इस साधना को पूर्णता देते हैं।

बाबा 14 वर्षों तक रहे मौन :  माघ मेला के दौरान यहां 12 करोड़ 51 लाख महामंत्रों का जप, एक लाख दीपों का प्रज्वलन और 101 कुंडों में निरंतर आहुतियां दी जा रही हैं। मौनी बाबा कहते हैं कि 14 वर्षों के मौन के बाद अब उनका हर संवाद सनातन धर्म की विजय का एक गरजता हुआ उद्घोष है।

 

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