नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि विधेयकों को स्वीकृति देने में देरी के कुछ मामलों की बजह से संविधान के अनुच्छेद 200 और 201 के तहत राष्ट्रपति और राज्यपालों के लिए फैसला लेने की समय सीमा तय करने को उचित नहीं ठहराया जा सकता।
चीफ जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस अतुल एस चदुरकर, को संविधान पीठ ने कहा, इस बारे में संविधान में पर्याप्त लचीलेपन का प्रावधान है. जिसके तहत बिना कोई समय सीमा तय किए विधेयकों को यथाशीघ्र लौटाने की बात कही गई है।
राष्ट्रपति की ओर से इस बारे में मांगे गए संदर्भ पर छठे दिन की सुनवाई के दौरान संविधान पीठ ने मंगलवार को मौखिक टिप्पणी में कहा कि यदि विधेयकों पर फैसला लेने के कुछ व्यक्तिगत मामले सामने आते हैं. तो पीड़ित पक्ष अदालत का दरवाजा खटखरा सकते हैं। इन व्यक्तिगत मामलों की सुनवाई कर अदालत निश्चित समय में फैसला लेने के लिए कह सकती है,
लेकिन इसके मायने यह नहीं है कि वह राष्ट्रपति और राज्यपाल के फैसला लेने के लिए समान समय सीमा निर्धारित कर दे।पीठ के सामने तमिलनाडु सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने वहां के राज्यपाल के मामले में शीर्ष कोर्ट की खंडपीठ की ओर से विधेयकों पर फैसला लेने के लिए निर्धारित तीन महीने की समय सीमा का समर्थन किया। सिंघवी ने कहा, राज्यपालों की ओरसे विधेयकों को बेमियाद रोके रखने के लगातार मामलों को देखते हुए यह सीमा जरूरी थी।
सिंघवी ने हाल ही में चीफ जस्टिस गवई की ओर से लिखे गए तीन जजों की पीठ के फैसले का हवाला दिया, जिसमें तेलंगाना विधानसभा अध्यक्ष को अयोग्यता याचिकाओं पर तीन महीने में फैसला करने का निर्देश दिया गया था। चीफ जस्टिस ने कहा, उस फैसले में कोर्ट ने निर्देश जारी किया था, जो सिर्फ उस मामले के लिए था। हमने यह निर्देश नहीं दिया था कि सभी विधानसभा अध्यक्ष अयोग्यता याचिकाओं पर तीन महीने में फैसला करें। वह मामले के तथ्यों व परिस्थितियों के अनुसार था। सिंघवी ने पेरारिवलन मामले का भी हवाला दिया, जहां राज्यपाल की ओर से क्षमा याचिका पर कार्रवाई न करने पर अदालत ने राजीव गांधी हत्याकांड के दोषियों को रिहा करने का निर्देश दिया था। इस पर जस्टिस गवई ने कहा कि ये अलग-अलग मामले हैं।
