जले हुए मरीजों को अब बिना इलाज अस्पतालों में बेवजह रोके नहीं रखा जा सकेगा। केंद्र सरकार ने साफ कर दिया है कि यदि किसी अस्पताल में इलाज की सुविधा उपलब्ध नहीं है तो मरीज को स्थिर कर सीधे उस अस्पताल में भेजना होगा, जहां समुचित इलाज संभव हो। संसाधन नहीं है, ऐसा कहकर इलाज टालने या मरीज को घंटों रोके रखने की अब कोई छूट नहीं होगी। यह निर्देश जलने के उपचार के लिए मानक दिशानिर्देश 2025 में दिए हैं जिसे केंद्र सरकार ने देशभर के लिए लागू किया है। पहली बार बर्न के इलाज को लेकर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी), जिला अस्पताल और मेडिकल कॉलेज तीनों स्तरों की स्पष्ट जिम्मेदारी तय की गई है।
राज्यों को जारी इन मानकों का चयन केंद्र सरकार ने 21 डॉक्टरों की संयुक्त समिति की सिफारिश पर किया है जिनमें से एक नई दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के बर्न विभागाध्यक्ष डॉ. मनीष सिंगल का कहना है कि आज भी बर्न मरीज को कई घंटे अस्पतालों में रोक लिया जाता है, जिससे संक्रमण और मौत का खतरा बढ़ जाता है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, भारत में हर साल 60 से 70 लाख लोग बर्न की घटनाओं का शिकार होते हैं जबकि 1 से 1.5 लाख मरीजों की मौत हो जाती है।
नए मानकों के अनुसार, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को पहली बार लिखित रूप में इलाज की जिम्मेदारी दी गई है। पीएचसी को अब हल्के बर्न (10% से कम) का प्राथमिक इलाज करना होगा। उनके पास ठंडा करना (कूलिंग), डेसिंग और टिटनेस इंजेक्शन उपलब्ध होगा। मरीज की स्थिति का आकलन कर समय पर रेफरल देना अनिवार्य होगा। अगर सुविधा उपलब्ध नहीं है तो मरीज को वहीं रोकना गलत माना जाएगा। ऐसे मामलों में मरीज को सीधे जिला अस्पताल भेजना होगा। इसी तरह के नियम जिला अस्पताल पर भी लागू होंगे और सुविधा न होने पर तत्काल मरीज को मेडिकल कॉलेज रेफर करना होगा।
