सौहार्द का पर्व या सियासत का हथकंडा?
पहली बार नहीं, फिर क्यों हो रहा है प्रोपेगेंडा?
“कौन कहता है कि हममें तुममें जुदाई होगी,
यह हवा जरूर इंसानियत के दुश्मन ने उड़ाई होगी।”
भारत विविधताओं से भरा देश है, जहां हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सभी अपने त्योहार आपसी भाईचारे के साथ मनाते आए हैं। यह कोई पहली बार नहीं हो रहा जब होली और जुमा एक ही दिन पड़ रहे हों। इससे पहले भी कई बार ऐसा हुआ है, और दोनों समुदायों ने अपने-अपने रीति-रिवाजों का सम्मान करते हुए त्योहार मनाया है।
लेकिन बीते कुछ वर्षों से जब दो समुदायों के पर्व एक ही दिन होते हैं, तो उसे लेकर सोशल मीडिया और कुछ सियासी ताकतें अनावश्यक विवाद खड़ा करने की कोशिश करती हैं। इस बार भी 14 मार्च को होली और जुमा एक साथ पड़ने के कारण तरह-तरह की बातें हो रही हैं। कुछ लोग इसे मुद्दा बनाकर समाज में नफरत फैलाने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि सच्चाई यह है कि भारत की गंगा-जमुनी तहजीब ऐसी रही है कि लोग सदियों से एक-दूसरे के त्योहारों की इज्जत करते आए हैं।
ऐतिहासिक रूप से देखें तो यह कोई पहली बार नहीं जब होली और जुमा एक ही दिन पड़े हों। पहले भी ऐसा होता आया है और लोग बिना किसी विवाद के अपने-अपने त्योहार मनाते रहे हैं। होली खेलने वालों ने कभी नमाज में रुकावट नहीं डाली, और जुमा की नमाज पढ़ने वाले भी होली खेलने वालों को शुभकामनाएं देते रहे हैं। फिर इस बार इतनी सियासत क्यों?
त्योहारों का मकसद आपसी भाईचारे को बढ़ावा देना है, न कि समाज में बंटवारा पैदा करना। दुर्भाग्य से, जब भी कोई बड़ा पर्व आता है, कुछ लोग इसे सियासत का मुद्दा बना देते हैं। लेकिन सच्चे भारतीय और सच्चे देशभक्त वही हैं जो नफरत के इस खेल को समझें और एक-दूसरे के पर्वों का सम्मान करें।
जरूरत इस बात की है कि हम सियासी बहसों से ऊपर उठें और त्योहारों को प्रेम, सद्भाव और सौहार्द के साथ मनाएं। अगर किसी के ऊपर रंग पड़ भी जाए, तो मुस्कुराकर उसे बधाई दें। यही इंसानियत है, यही देशभक्ति है, और यही सच्चे अर्थों में भारतीय संस्कृति की पहचान है।
आप सभी देश, प्रदेश के लोगो लोगो को होली की शुभकामनाएं।
