इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने मैसर्स विज़िटेक प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ जारी अनिश्चितकालीन ब्लैकलिस्टिंग के आदेश को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि बिना किसी समय-सीमा के किसी संस्था को ब्लैकलिस्ट करना मनमाना है और इसका प्रभाव ‘नागरिक मृत्यु’ के समान होता है। यह संविधान की ओर से दिए गए मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। यह आदेश न्यायमूर्ति अजीत कुमार और न्यायमूर्ति स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने दिया है।
यह मामला समग्र शिक्षा अभियान के तहत शाहजहाँपुर जिले में 168 ईसीसीई शिक्षकों और 40 तकनीकी प्रशिक्षकों की आपूर्ति से जुड़े अनुबंध से संबंधित है। जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी ने 29 सितंबर 2025 को कंपनी को 504 अभ्यर्थियों की मेरिट सूची तैयार करने और दस्तावेजों का सत्यापन कराने का निर्देश दिया गया था। कंपनी का कहना था कि यह कार्य उनके मूल अनुबंध का हिस्सा नहीं है और कार्यक्षेत्र का एकतरफा विस्तार है। इसके बाद 26 नवंबर 2025 को कंपनी को अनिश्चितकाल के लिए ब्लैकलिस्ट कर दिया गया। याची कंपनी ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी।
खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि ब्लैकलिस्टिंग जैसी कार्रवाई किसी संस्था के व्यवसायिक अस्तित्व को गंभीर रूप से प्रभावित करती है, इसलिए इसे स्थायी नहीं बनाया जा सकता। कोर्ट ने यह भी पाया कि कंपनी द्वारा दिए गए स्पष्टीकरणों पर समुचित विचार नहीं किया गया और जिन दस्तावेजों के आधार पर कार्रवाई की गई, वे कंपनी को उपलब्ध नहीं कराए गए, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है।
हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि जिस अधिकारी ने शिकायत की, वही इस मामले में निर्णयकर्ता नहीं हो सकता। सरकारी आदेशों के अनुसार, ऐसे मामलों में निर्णय लेने का अधिकार जिला मजिस्ट्रेट को है, न कि जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी को।
कोर्ट ने 26 नवंबर 2025 के ब्लैकलिस्टिंग आदेश को रद्द करते हुए मामला जिला मजिस्ट्रेट, शाहजहाँपुर को नए सिरे से विचार के लिए भेज दिया है। साथ ही, अंतरिम राहत देते हुए कंपनी को जिला मजिस्ट्रेट के निर्णय तक या अगले आठ सप्ताह तक भविष्य के टेंडरों में भाग लेने की अनुमति दी गई है।
