नई दिल्ली। चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के जरिये अपात्र व्यक्तियों को हटाने से चुनावों की पवित्रता बढ़ेगी। आयोग ने कहा, इस प्रक्रिया का मकसद मतदाता सूची की शुद्धता में जनता का विश्वास बहाल करना है।
एसआईआर को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं पर 88 पेज के जवाबी हलफनामे में आयोग ने कहा, पुनरीक्षण के दौरान मतदाता सूची में शामिल करने के लिए वोटर कार्ड, आधार और राशन कार्ड को वैध दस्तावेज के रूप में मंजूर नहीं किया जा सकता। आयोग ने कहा, यह जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के नियम 21(3) के तहत नए सिरे से वोटर लिस्ट के पुनरीक्षण की प्रक्रिया है। वोटर कार्ड मौजूदा सूची की प्रविष्टियों पर आधारित हैं और स्वयं पुनरीक्षण के अधीन हैं।
आयोग ने दोहराया, आधार कार्ड को मतदाता सूची में शामिल करने के लिए वैध दस्तावेज के रूप में मान्यता नहीं दी जा सकती क्योंकि यह नागरिकता स्थापित नहीं करता और केवल पहचान का प्रमाण है। आयोगने इसके समर्थन में कई वैधानिक प्रावधानों और न्यायिक मामलों का हवाला दिया। एसआईआर के दौरान स्वीकार्य दस्तावेज की सूची से राशन कार्ड को बाहर किए जाने के लिए आयोग ने फर्जी कार्डों की मौजूदगी को वजह बताया। इसने केंद्र सरकार की सात मार्च की प्रेस विज्ञप्ति का हवाला दिया, जिसमें कहा गया है कि उसने पांच करोड़ फर्जी राशन कार्ड निरस्त कर दिए हैं।
आयोग ने कहा कि इसके बावजूद र वह एसआईआर के दौरान पहचान स्थापित करने के बेहद सीमित मकसद के लिए इन तीनों कार्डों की अनुमति दे रहा है। आधार का इस्तेमाल अन्य दस्तावेज के साथ पूरक के रूप में किया जा सकता है। आयोग ने हलफनामे में कहा, वोट का अधिकार जनप्रतिनिधित्व अधिनियम-1950 की धारा 16 व 19 के साथ संविधान के अनुच्छेद 326 और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम-1951 की धारा 62 से प्राप्त होता है। इनमें नागरिकता, आयु और सामान्य निवास के संबंध में कुछ योग्यताएं निर्धारित हैं। अपात्र व्यक्ति को मतदान का अधिकार नहीं है।
