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तेल की कीमत के साथ बढ़ती भारत की महंगाई अगर इस्राइल और ईरान के बीच युद्ध न थमता 

जब दो देशों के बीच युद्ध केवल रणभूमि को ही नहीं झुलसाती, बल्कि वैश्विक संबंधों, व्यापार, तेल, पूंजी और जनजीवन की शिराओं में भी तपिश भर देती है। इस्राइल और ईरान दो वैचारिक ध्रुवों पर खड़े राष्ट्र यदि सीधे लंबे युद्ध में उलझते तो उसकी लपटें भारत जैसे ऊर्जा निर्भर, विकासशील और भू-राजनीतिक रूप से सक्रिय देश को भी प्रभावित सकती थीं।

 

ऐसी स्थिति में सबसे पहला और तीव्र प्रभाव कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी के रूप में सामने आता।

 

भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल आयातक देश है। वर्ष 2023-24 में भारत ने 235.6 मिलियन टन कच्चा तेल आयात किया, जिसकी लागत लगभग 158 बिलियन डॉलर रही।

 

ईरान और उसके सहयोगी देशों से होने वाली आपूर्ति यदि युद्ध के कारण बाधित होती तो अंतरराष्ट्रीय’ बाजार में तेल के दाम तेजी से बढ़ते । इसका सीधा असर भारत के चालू खाता घाटे पर पड़ता।

 

जब भारत को महंगे दामों पर तेल खरीदना पड़ता तो आयात बिल बढ़ता और विदेशी मुद्रा भंडार पर भीद बाव बढ़ता। परिणामस्वरूप, रुपये की कीमत गिर सकती थी। जैसे 2022 में जब तेल की कीमतें बढ़ीं तो भारतीय रुपया 83.2 प्रति डॉलर के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया था।

 

पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ने पर इसका असर खाद्य पदार्थों, परिवहन और उत्पादन लागत पर भी पड़ता। ट्रांसपोर्ट महंगा होता, जिससे सब्जी, दूध और अनाज जैसी आवश्यक वस्तुएं भी महंगी हो जातीं। इससे उपभोक्ता महंगाई दर में वृद्धि होती, जो रिजर्व बैंक को मौद्रिक नीति सख्त करने के लिए विवश कर सकती थीइस का परिणाम होता कि ब्याज दरें बढ़ती और लोन महंगे हो जाते, जो आम जनता और छोटे उद्योगों के लिए चुनौतियां पेश करते। युद्ध का असर वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर भी पड़ता है।

 

भारत, विशेषकर यूरोप और पश्चिम एशिया के देशों से विभिन्न प्रकार के रसायन, उर्वरक, गैस और खनिज पदार्थों का व्यापार करता है। ईरान से यूरिया और मिथनॉल जैसी सामग्रियां भी भारत लाता है। युद्ध के कारण यदि व्यापार मार्ग प्रभावित होते तो कृषि और ‘उद्योग पर विपरीत प्रभाव पड़ता।

 

भारतीय शेयर बाजार, जो वैश्विक संकेतों पर संवेदनशील होता है, ऐसे युद्धकालीन अनिश्चितताओं में तेज गिरावट का शिकार होता है। इसलिए भारत के लिए यह समय केवल देखना या प्रतिक्रिया देना नहीं है, बल्कि पूर्व तैयारी, वैकल्पिक ऊर्जा स्त्रोतों पर निवेश, कूटनीतिक संधियों का पुनरावलोकन आपातकालीन और रणनीतियों के क्रियान्वयन का समय है।

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