सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर अपराधों में पीड़ितों को मुआवजा बढ़ाने और आरोपियों की सजा को मनमाने ढंग से कम करने की अदालतों की हालिया प्रथा की निंदा की है। सर्वोच्च न्यायालय ने इसे एक खतरनाक प्रवृत्ति करार दिया, जो समाज को यह गलत संदेश दे रही है कि अपराधी केवल पैसे देकर खुद को दोषमुक्त कर सकते हैं।
जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने कहा कि सजा का उद्देश्य प्रभावी निवारण करना है ताकि भविष्य में ऐसे ही अपराध या कृत्य न हों और उनमें कमी लाई जा सके। सजा देते समय इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि सजा न तो बहुत कठोर हो और न ही इतनी नरम हो कि उसका निवारक प्रभाव कम हो जाए। पीठ ने कहा कि विभिन्न न्यायालयों की ओर से मुआवजे को सजा के विकल्प के रूप में मानने की गलत समझ चिंता का विषय है।
यह एक ऐसी प्रथा है जिसकी निंदा की जानी चाहिए। पीठ ने आगे कहा, हमने विभिन्न उच्च न्यायालयों में एक प्रवृत्ति देखी है जिसमें निचली अदालत द्वारा अभियुक्तों को दी गई सजा को न्यायिक विवेक के किसी स्पष्ट प्रयोग के बिना मनमाने ढंग से और यांत्रिक रूप से कम कर दिया जाता है।
पीठ ने कहा, पीड़ित को देय मुआवजे को बढ़ाने और सजा को कम करने की प्रथा, विशेष रूप से गंभीर अपराध के मामलों में, खतरनाक है क्योंकि यह समाज को गलत संदेश दे सकती है कि अपराधी या आरोपी व्यक्ति केवल आर्थिक मुआवजा देकर अपने अपराध से मुक्त हो सकते हैं। शीर्ष अदालत ने ये टिप्पणियां मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ की ओर से दिए गए एक फैसले पर सुनवाई करते हुई की ।
